अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

रूकना... चल देना...

एक जगह...
एक वजह...
इतना तो चाहिए ही,
कहीं रुकने के लिए...


वरना भला है चलते जाना ही
चलते जाते हैं,
चले ही जाते हैं...
मोड़ से मुड़ते हुए
हम ही नहीं बिसारते पुरानी राह को,
उनकी स्मृतियों से हम भी बिसर जाते हैं...


इतने लम्बे रास्ते हैं...
इतना विस्तार है...
सब पर चल लेना हमारी क्षमताओं से ही नहीं,
हमारी कल्पना से भी पार है...


सो वजह मिल जाती है,
तो हम रुक जाते हैं...
पड़ाव के मोह से बंध,
मिट्टी में कुछ बीज रोपते हैं, कुछ फूल उगाते हैं...


समय सींचता है हमें...


जगहों और वजहों से परे
फिर एक दिन हम स्वयं किसी बाग़ का फूल हो जाते हैं...


यात्रा है
चले...


जागती आँखों में भी
उर्वर स्वप्न पले... !!





6 टिप्पणियाँ:

sunita agarwal 2 जनवरी 2016 को 11:34 am  

यात्रा है
चले...

जागती आँखों में भी
उर्वर स्वप्न पले... !!
SAHI YATRA HAI :) UMDA RACHNA NAV VARSH KI SHUBHKAMNAYE :)

अनुपमा पाठक 2 जनवरी 2016 को 12:46 pm  

आपको भी नववर्ष की शुभकामनाएं, सुनीता जी !!

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 2 जनवरी 2016 को 4:49 pm  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (03-01-2016) को "बेईमानों के नाम नया साल" (चर्चा अंक-2210) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

ब्लॉग बुलेटिन 2 जनवरी 2016 को 7:22 pm  

ब्लॉग बुलेटिन टीम की ओर से आप सब को नव वर्ष के अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएं|

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, सभी को नए साल की हार्दिक शुभकामनाएं - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

PBCHATURVEDI प्रसन्नवदन चतुर्वेदी 3 जनवरी 2016 को 7:19 pm  

बेहतरीन.... आप को नववर्ष की शुभकामनाएं....

Asha Joglekar 4 जनवरी 2016 को 1:46 am  

Bahut sunder.

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