अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

संभावनाओं के नाम... !!

कभी देखना समंदर
आँखों में...
कभी आँखों के आगे
समंदर देखना...


बाहर ही बाहर
विचरते रहते हैं हम...
कभी चलना हो भीतर-भीतर भी
देखें क्या-क्या भेद खोलता है फिर, ये अपने अंदर देखना...


सांसों की आवाजाही का संगीत
जब थमना है थम जाए...
हर क्षण, अपने होने में
यूँ, न होने का, मंज़र देखना...


तट पर उगती हुई संभावनाओं!
कुछ तुम्हारी जिजीविषा का भी प्रताप है,
सब है विधिगत लेख ना...


उगते हुए तुम
उदीयमान सूरज के वैभव को प्रतिविम्बित करता
विराट समंदर देखना...


यूँ देखते-देखते, हो घटित, अपने अंदर देखना... !!

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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