अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

एक इंतज़ार उग आया है...

एक इंतज़ार
अनायास उग आया है...
ज़िन्दगी को थाहती आँखों में
जीवन का ही अक्स समाया है...


पल पल बीतते पल
जैसे आसमान से गिरती हुई बूँदें हैं...
पत्तों पर उनके गिरने से
आकृतियों का एक संसार उभर आया है...


कहीं से छिटक कर कहीं जो
एक पल रह जाता है...
वह अपनी चुप्पी में भी
कितनी ही बातें कह जाता है...


उग आये इंतज़ार को
ज़िन्दगी अपनी परिधि में जीती है...


बीतते पलों के साथ मिटते हुए भी
एक अंश है ऐसा, जो जस का तस, 

सुरक्षित रह जाता है...


इंतज़ार की जड़ें 

और गहरी होती हैं...
खिलते खिलते फिर, कोई लम्हा, खिल आता है... !!




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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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