अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

फिर एक सफ़र आँखों के आगे है...

अनलिखी यात्राएं...
जो कलमबद्ध न हो पाए वे संस्मरण...


आवाज़ देते हैं... !


हवाओं का शोर...
अनजान शहरों की जानी पहचानी सी गलियां...
सब वाकये लिख जाने थे
कम से कम सोचा तो यही था...


लेकिन...
रह गया...


सफ़र अभी बाक़ी है...
इस बीच कितना समय अपनी गति से बह गया...


आज यूँ ही
उनके न लिखे जाने पर
ये कविता सा कुछ जो लिख रहे हैं...
तो कितने ही मोड़
पीछे से
आवाज़ देते दिख रहे हैं...


शायद ही उनतक फिर दोबारे लौटना हो... !


लिख कर उन्हें सहेज लेना था...
कदमों की गति को उकेर लेना था...


कि सफ़र यादों में टंकित रह जाये...
स्याही की बूँदें उसको गाये... !!


कोई बात नहीं...


जो रह गया
उसे अगले अवकाश में लिख जायेंगे...
मन में तब तक और रच बस ले
उसमें ही कहीं हम भी दिख जायेंगे...


अभी आँखों में बहुत सारे सपने हैं...
ये सपनों के सच होने का समय है...


कि चिरप्रतीक्षित एक सफ़र
आँखों के आगे है...

इस बार जानी पहचानी है डगर...

ये यात्रा मुझे ले जाने वाली है
मेरे अपने देश... मेरे अपने घर... !!

7 टिप्पणियाँ:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 23 जनवरी 2016 को 11:41 am  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (23-01-2016) को "कुछ सवाल यूँ ही..." (चर्चा अंक-2231) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Ashok Saluja 23 जनवरी 2016 को 3:11 pm  

बहुत बहुत शुभकामनाये चिरप्रतीक्षित सफ़र के लिए .....बाहें पसारे अपना देश तुमे घर पुकारे |

Onkar 24 जनवरी 2016 को 11:40 am  

बहुत सुन्दर

Anil Sahu 31 जनवरी 2016 को 3:12 pm  

सुंदर रचना.

ब्लॉग बुलेटिन 8 मार्च 2016 को 2:40 pm  

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " औरत होती है बातूनी " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Anupama Tripathi 10 मार्च 2016 को 3:19 am  

ये यात्रा मुझे ले जाने वाली है
मेरे अपने देश... मेरे अपने घर... !!
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति !!

रश्मि प्रभा... 6 नवंबर 2016 को 11:59 am  

इस सड़क से
उस सड़क
बहुत तय किया सफर
अपने देश अपने गाँव का पता दो
यायावर मन
देखने को
सुनने को
अथक चलता रहा है
विराम तो दो ...

यह न कविता है
न संस्मरण
एक भावना है
जो बंद दरवाज़ों की साँकलें खटखटा रहा

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