अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

दुरुहताओं के बीच...

ऐसा कई बार हुआ है...


कितनी ही बार कविता ने मुझे बचाया है...


कभी मेरी कलम से रिस कर...

उसने मुझे रचा है...


तो कभी दूर क्षितिज से आई
किसी कालखंड में रची, किसी की कोई कविता, संबल बनी है...


जैसे मेरे लिए ही रची गयी हो
उस एक क्षण के लिए अवतरित हुई हो
कि उसे आत्मसात कर निकल सकूं अवसाद से...
कितना कठिन होता है निकलना अन्यान्य उलझनों के प्रासाद से...


दुरुहताओं के बीच
कविता ही है जो कर सकती है अनेकानेक उपक्रम
कि उसके होने में है
कई उलझनों की सहज सुलझन 


मेरी ऊँगली थामे
कविता हर बार ले आई मुझे जीवन के मुहाने 


कविते! रखना आद्र मन की माटी को...
संभाले रखना जीवन की थाती को... !!

2 टिप्पणियाँ:

Dilbag Virk 6 जनवरी 2016 को 2:27 pm  

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 07-01-2016 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2214 में दिया जाएगा
धन्यवाद

Dr (Miss) Sharad Singh 7 जनवरी 2016 को 7:48 am  

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ....

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

ब्लॉग से जुड़िए!

कविताएँ