अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

सच ही कहती थीं अश्रु लड़ियाँ...


कष्ट होता है
तो अनायास ही आंसू बहते हैं...
रोते हैं हम...

रो लेते हैं हम...


पर रो लेने के बाद के कष्ट का क्या... ??


आँखें बेतरह दुखती हैं...
मन भी बेतरह दुखता है...


कि...
किसी ने परवाह न की आंसुओं की...
उन्हें बहने दिया गया...


हम रो रहे थे और हमें रोने दिया गया...
रोते रहने दिया गया... !


दर्द ठहर जाता है...
एक वक़्त के बाद आंसू नहीं बहते...
मन ही रेशा-रेशा हो कर आँखों से बह जाता है...


उस छोर तक जब पहुँच गए
फिर क्या लौटना... !


आंसुओं !
यूँ ही अविरल बहना...
मेरे ही दामन में सिमटना... 


और समेटना 

कहे-अनकहे अनाम दर्द की अनगिन पातियाँ...
अपने प्रगल्भ वृत्त में...


सच ही कहती थीं अश्रु लड़ियाँ--
" जीवन गरल, अमृत मैं "


4 टिप्पणियाँ:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 16 जनवरी 2016 को 10:45 am  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (17-01-2016) को "सुब्हान तेरी कुदरत" (चर्चा अंक-2224) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

प्रवीण पाण्डेय 17 जनवरी 2016 को 4:07 am  

स्तब्धता में कुछ ही बह जाये, अच्छा लगता है।

Onkar 17 जनवरी 2016 को 4:18 am  

बहुत सुन्दर

Asha Joglekar 17 जनवरी 2016 को 7:01 pm  

अश्रू बहा ले जाते हैं सब कुछ अपने साथ, फिर ना दुख रहता है न आँसू।

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