अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कुछ प्रश्नों का कहीं हल नहीं है... !!

अभी था...
अभी नहीं है...


सूरज जैसा तेज़
जब डूबता उभरता प्रतीत होता है घड़ी-घड़ी
फिर परछाईयों की
क्या ही बिसात !


अभी थी...
अगले पल नहीं है...


कुछ प्रश्नों का कहीं हल नहीं है... !


प्रश्न भी हों
और उत्तरित भी हो जायें
ऐसा कहाँ होता है 


दोनों साथ हों हासिल
ये कब यहाँ होता है 


कभी अपने हिस्से का आकाश गुम 

कभी थल नहीं है...


कुछ प्रश्नों का कहीं हल नहीं है... !!




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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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