अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

काश...


कोई सोच नहीं, कोई फ़िक्र नहीं...
काश न होती पीड़ा, न ही होता पीड़ा का ज़िक्र कहीं...


यूँ खिड़की से झांकते हुए
इस बर्फ़ की बारिश को देखते 

पल पल विरचते जादू को महसूसते

थमे हुए पल में एक मुट्ठी बर्फ़ हथेलियों में भरकर हँसते


होती ऐसी...
हो पाती ऐसी स्थिति... काश !
ये मौसम लौट तो आया है...
लौट पायें हम भी उस मौसम को जीने की स्थिति में...
ये आश्वस्तताएं लेकर थोड़े ही बरसता है आकाश... !!


झिलमिल श्वेत में सब धुंधला है...
छोटा सा वृत्त दृष्टि का, कहाँ कोई दृश्य देर तलक संभला है...


वैसे तो पल है, हर पल पिघल रहा है...
इस उथल पुथल में, जीवन निकल रहा है... !!

3 टिप्पणियाँ:

ब्लॉग बुलेटिन 8 जनवरी 2016 को 2:10 pm  

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, अपेक्षाओं का कोई अन्त नहीं - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 8 जनवरी 2016 को 2:19 pm  

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (09-01-2016) को "जब तलक है दम, कलम चलती रहेगी" (चर्चा अंक-2216) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

ई. प्रदीप कुमार साहनी 9 जनवरी 2016 को 1:48 pm  

भावपूर्ण प्रस्तुति ।

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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