अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

मझधार में अटकेगी या पार उतरेगी... ?

ये सुबह का आकाश है...


घंटों बीतेंगे अभी
तब बर्फ़ से ढँकी श्वेत धरा देख पायेगी 

ज़रा सी लाली कभी... !


इस यात्रारत चाँद को देखते हुए
नाव का स्मरण हो आता है...


मझधार में अटकेगी 

या पार उतरेगी... ?


कितना रहस्यमय है सब, 

एक ही आकाश, 

रोज़ अलग नज़ारे...
रोज़ गुज़रता है, 

रात के स्याह सागर से चाँद, 

जाने किसके सहारे... !!


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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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