अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

ज़िन्दगी के खेल में...

पिघलते बर्फ़ के फ़ाहों के साथ
कुछ लम्हे भी पिघल रहे थे...
श्वेत श्याम से माहौल में
अनदेखे कुछ दीये
जी जान से जल रहे थे...


दीपक की लौ
डगमग करती
फिर स्थिर हो जाती थी...
हवा पानी के अपने करतब थे
सब अपनी धुन में चल रहे थे...


इन्हीं सब के बीच...
इन्हीं सबमें...
कहीं हमारा भी होना था...


कभी हम जलती हुई लौ थे...
कभी थे उसी लौ को बुझाती हुई हवा...


ज़िन्दगी के खेल में दोनों बराबर शामिल थे
दर्द और दवा... !!


3 टिप्पणियाँ:

प्रियंका गुप्ता 11 जनवरी 2016 को 5:25 pm  

ज़िन्दगी के खेल में दोनों बराबर शामिल थे
दर्द और दवा... !!

अदभुत...!!!

ब्लॉग बुलेटिन 12 जनवरी 2016 को 12:18 pm  

आज सलिल वर्मा जी ले कर आयें हैं ब्लॉग बुलेटिन की १२०० वीं पोस्ट ... तो पढ़ना न भूलें ...
ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "तुम्हारे हवाले वतन - हज़ार दो सौवीं ब्लॉग बुलेटिन " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

parmeshwari choudhary 12 जनवरी 2016 को 6:32 pm  

सुन्दर !

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कुछ बातें अनूठी है!
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मेरे आँगन में...
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अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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