अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

नमन शहीदों को...

बर्फ़ की एक पतली चादर से
प्रकृति ने जैसे
ढंक दिया हो मन का धरातल...
कफ़न ओढ़ लिया जीवन ने
देखते रह गए
संवेदनाओं के मरुथल... 


धीरे से उगा सूरज...
बिना किसी तड़क भड़क के साथ...
शोक संतप्त हैं उसके भी प्राण...
कि जो शहीद हो गए उनके घर कैसा हृदयविदारक होगा विहान... 


मौन प्रार्थना उनके नाम...
उन्होंने जी लिया चंद पलों में जीवन का वितान... 


नमन...
विदा देता हुआ अश्रुपूरित सकल चमन... !!

1 टिप्पणियाँ:

अजय कुमार झा 5 जनवरी 2016 को 4:57 pm  

नमन शहीदों को

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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