अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

हम भी वहीं कहीं होंगे...


स्कूल के दिनों की याद...
कविता फिर हुई कहाँ उन लम्हों के बाद...


हमारा बचपन रूठा...
अपना शहर छूटा...


कितना कुछ टूट गया...
वक़्त के साथ स्मृतियों का कारवाँ लूट गया...


फिर भी सांस लेती रही दोस्ती...
लगाव कहाँ कम हुआ कभी...


मिलेंगे जो रास्तों में कहीं...
फिर से जी लेंगे वो गुज़रा हुआ जीवन भी...


कविता बहेगी...
समय के अंतराल को वो शब्द शब्द जीती हुई मिलेगी... 


हम भी वहीं कहीं होंगे...
हम भी फिर कविता सा हो लेंगे... !!

3 टिप्पणियाँ:

Dilbag Virk 13 जनवरी 2016 को 2:54 pm  

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 14 - 01- 2016 को चर्चा मंच पर <a href="http://charchamanch.blogspot.com/2016/01/2221.html> चर्चा - 2221 </a> में दिया जाएगा
धन्यवाद

Shekhar Suman 13 जनवरी 2016 को 5:45 pm  

सच में, आप यहीं हैं इसी कविता में... :)

संगीता स्वरुप ( गीत ) 15 जनवरी 2016 को 6:41 am  

अविस्मर्णीय स्मृतियाँ

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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