अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

देखो, भूल न जाना...

पुल को
पार कर...
उसे
भूल न जाना...


क़दमों के निशान
रह जाते हैं...
ज़रा सोच समझ कर
कदम बढ़ाना...



नाज़ुक से बंधन
तोड़ न जाना...
देखो, मिले हो किस्मत से
छोड़ न जाना...


अक्सर ऐसा होता है --



सामने वाले की आँखों के आगे
अँधेरा छा जाए...
इस ख़ातिर
जारी रखते हैं वो धूल उड़ाना...


ये रीत है यहाँ की
राहों में रोड़े अटकाए जाते हैं...
राही! उन रोड़ों से ही
तुम पुल बनाना...


अँधेरी राहों में
अंजुरी भर रौशनी हेतु...
अपनी समस्त पूँजिया लगाकर भी
दीये जलाना...  


हारती हुई आशा की
बढ़कर बाहें थाम लेना...
डूबती नैया की
तुम पतवार हो जाना...


राही! यूँ चलना राहों में...
व्यष्टि से समष्टि, समष्टि का सार हो जाना...


यहीं रहना और यहीं रहकर इस दुनिया से पार हो जाना... !! 


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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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