अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

बस ऐसे ही...!!


ये विचित्र लोग हैं... ये जगह विचित्र है... यहाँ केवल लोगों को टांग अड़ाने से मतलब है... दूसरों की शान्ति भंग करना... ये फ़ेवरेट हॉबी है लोगों की... और बेहद सिद्दत के साथ प्रैक्टिस में भी है ये हॉबी यहाँ...
कहाँ की बात कर रहे हैं हम... ??? अरे भई! यहीं की... हमारे आसपास की... हमारी दुनिया की... हमारे समाज की... हमारी आपकी और हमारी इस आभासी दुनिया और यहाँ के मित्रों की... आभासी है तो क्या... रियल वर्ल्ड को तगड़ा कॉम्पिटीसन देती है... और कहीं कहीं तो बहुत पीछे छोड़ देती है हमारी असल दुनिया को...
सबकी अपनी स्पेस है... सबकी अपनी समझ... अपनी अपनी क्षमताएं हैं... ये बात खूब समझते हैं हम... लेकिन लिखे हुए को पढने की सामान्य तमीज और एक मिनिमम शिष्टाचार तो होना ही चाहिए... जरूरी नहीं कि हर बात समझ में आ ही जाये... हर एक बात समझनी आवश्यक भी नहीं... उसी तरह हर एक पोस्ट पर अपनी उपस्थिति और बुद्धि दिखाने के लिए बे सर पैर के कमेंट करना भी जरूरी नहीं... ! हम सबके पास लिमिटेड समय है... सब तक तो पहुंचा भी नहीं जा सकता... न सब पढ़ा ही जा सकता है और न ही ये कोई लेन देन की परिपाटी निभाने हम इधर हैं कि आप आये तो हम भी आये हीं... अपनी उपस्थिति जताने...!
अपनी रुचि के अनुरूप लिखें पढ़ें हम... जिन्हें पहुंचना होगा वो पहुंचेंगे हम तक... जहाँ पहुंचना होगा अपनी रुचि और समय के अनुरूप हम पहुंचेंगे... इस सामान्य सी बात में कितना बड़ा गणित है कि किसी को समझ ही नहीं आता...
शायद हममें ही कोई समस्या होगी... तो हमसे दूर रहा जाये... अपनी अपनी शान्ति... अपना अपना स्पेस हम सबको मुबारक हो...!!!
*** *** ***
हे जीवन!

थोड़ा रुका करो...
थोड़ा ठहरा करो...

कभी तो वक़्त दो...
कभी तो बात हो...

बस भागते रुठते ही बीत जाओगे...
ये अनमने से गीत कबतक गाओगे... ??


1 टिप्पणियाँ:

सुशील कुमार जोशी 15 अगस्त 2015 को 4:29 pm  

सटीक ।

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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