अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

यही तो है रक्षा पर्व... !!!


बीतते समय के साथ कितना कुछ है जो बीत जाता है... ये सच है कि  इस बीतने में अपनी आस्था एवं श्रद्धा को तो बचाया ही जा सकता है पर कितनी बार ऐसा होता है कि आस टूटने लगती है और निर्मम समय सभी कोमल भावों को रौंदता हुआ अपनी गति से आगे बढ़ जाता है... ! रिश्तों के बीच नहीं आना चाहिए समय की निर्ममता को, आता भी नहीं है पर वो पहले वाली बात तो नहीं ही रह जाती है... वो बचपन तो खो ही जाता है जब बुआ लोग का आना देखा था इस दिन... पापा को राखी बाँधने... हम लोगों के साथ खूब एन्जॉय करने... !! श्रावण पूर्णिमा अब वैसे उत्साह के साथ तो नहीं ही आती है जमशेदपुर मेरे घर में... अब दूर बसी बहनें और दूर जो होती जा रहीं हैं... हो गयीं इन बीते वर्षों में... जीवन की क्षणिकता ने कितनो को हमसे छीन लिया... मम्मी से बात होती है तो यही कहती हैं... यहाँ कहाँ राखी... सच, है... मम्मी के भाई आसपास नहीं तो फिर क्या सेलिब्रेशन, अब पापा की भी राखी नहीं आती कहीं से तो यह त्योहार कम से कम मेरे घर से तो विदा सा ही हो चुका है... हम चारों भाई बहन भी चार जगह हैं... कोई घर पर नहीं है कि कभी पुराने दिन लौटें... उत्सव का कोई माहौल बने इस दिन... खैर...
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टाटा मर्सी हॉस्पिटल में मम्मी का ऑपरेशन हुआ था कभी, जिन्होंने उनकी देखभाल की थी... उनसे जैसे हमेशा के लिए रिश्ता सा जुड़ गया... उनका नाम मर्सी हॉस्पिटल से एसोसिएट करके ही हमलोग लेते रहे हमेशा... मम्मी के डिस्चार्ज होने के बाद भी वो हमेशा आती रहीं घर... कई वर्षों तक फिर ये तो निश्चित रहा कि और कहीं दूर से आये न आये... इनकी राखी ज़रूर सजेगी पापा की कलाई पर... समय ने इस मुंहबोली बुआ को भी हमसे छीन लिया... ! मेरी शादी में... (पांच वर्ष से ज्यादा पुरानी बात नहीं है)... उन्होंने बढ़ चढ़ कर अपनी उपस्थिति और गीतों से माहौल बनाये रखा... और देखते देखते इस कुछ ही समय में उनका प्रस्थान भी हो गया इस जग से... !
नानी भी अब नहीं है... नहीं तो उनका भी उत्साह देखा है इस दिन के लिए... उस उम्र में भी नैहर के प्रति जो ललक थी कि बस... नानी के भतीजों ने निभाया भी... नानी के अंतिम समय तक... उनकी ललक का सम्मान... और नैहर के प्रति मोह का जीवनपर्यंत मान रहा...!
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हम चारों भाई बहन इतनी दूर हैं कि साथ इकठ्ठा होना सपना ही है... फिर भी, थैंक्स टू फ़ेसबुक एंड स्काइप, कि एक क्लिक पर दूरी के आभास को कम करने की क्षमता तो रखता ही है... यही सब सहारा हैं हमारे समय का... दुनिया सिमट गयी है... पर समय ने हमें इतना व्यस्त कर दिया है कि हम चाह कर भी इस सिमटी दुनिया के एक छोर से दूसरे छोर तक नहीं जा सकते... ये परिधि नापना लगभग असम्भव ही तो हो चला है... खैर, स्नेह कब बंधा  है इन बातों से... धागा तो बंधा ही हुआ है... धागे ने बाँध ही रखा है हम सबको एक ही सूत्र में!
इस पावन पर्व की भावना वसुधैव कुटुम्बकम के भाव से ही तो अनुप्राणित है... इस स्नेहसूत्र ने हम सबको बाँध ही तो रखा है एक सुन्दर भाव के अंतर्गत... ! ये भावनाएं प्रबल रहे... सभी दिनों में... प्रतिबद्धता हो सभी बहनों... सभी की बहनों... के प्रति...  तो देश दुनिया की कितनी ही सामाजिक समस्याएं स्वतः हल हो जाएँ... !
यत्र नयास्तु पूज्यन्ते वाला देश है हमारा... इसकी गरिमा के अनुरूप तो नहीं ही है वर्तमान परिवेश हमारा... बदले यह परिदृश्य... परिष्कृत हों हम... सुन्दर हो जीवन... यही तो है रक्षा पर्व... !!!

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
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