अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कौन नाता...?

तेरा मेरा
कौन नाता...?


कभी आंसुओं से
तो कभी ओस से
है सींचा जाता...??


कभी
कह देते हैं
दर्द समंदर...
कभी
इस नाते को कर लेते हैं
ज़िन्दगी का पक्षधर... 


कभी नदिया बहती है
कभी हम स्वयं
भावों संग बह जाते हैं...
अनगिन जन्मों में से
इसे किसी पूर्व जन्म के
संस्कार कह जाते हैं...


एक ही
गगन के नीचे हैं
तो पास ही हुए न...
रिश्तों ने
रिश्ता जोड़ लिया
हमने कोई क्षितिज छुए न... 


कैसे कैसे भाव
गढ़ जाती है नमी...
सबकुछ तो है
फिर है किस बात की कमी... 


क्यूँ ये
छाई हुई उदासी है...?


ज्यादा
नहीं सोचना,
बात ये ज़रा सी है... !!



4 टिप्पणियाँ:

Dilbag Virk 19 अगस्त 2015 को 4:50 pm  

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 20 - 08 - 2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2073 में दिया जाएगा
धन्यवाद

ब्लॉग बुलेटिन 19 अगस्त 2015 को 7:59 pm  

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, आज की हकीकत - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Kajal Kumar 20 अगस्त 2015 को 7:10 am  

हां बात तो ज़रा सी ही है गर सोचा न जाए ...

Anita 20 अगस्त 2015 को 11:24 am  

सुंदर भावपूर्ण..

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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