अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

ये दिन और कुछ यादें...!

वाराणसी कैंट रोड स्थित भारत माता मंदिर  में बैठ दीवारों पर अंकित वन्दे मातरम् गीत कागज़ पर उतारना याद आता है...
भारत माँ की दिव्यता की प्राणप्रतिष्ठा मंदिर को विशिष्ट बनाती है... यहाँ कई बार जाना हुआ... भारत का मानचित्र देख खो जाते थे... मानचित्र पर बनी नदियों और पहाड़ों की यात्रा पर निकल जाता था मन... आज भी तो यात्रारत ही हैं हम... भले कहीं भी हो... मन से तो वहीँ हैं... अपनी माटी के पास और जहाँ हैं वहां बसा रखा है हमने अपने मन आँगन में अपना भारत...!!!

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रानी लक्ष्मी बाई की जन्मस्थली है काशी... उनके जन्मस्थान पर अभिलिखित है "काशी की कन्या, झाँसी की रानी"... यह इन्स्क्रिप्सन उनके इस स्थान से सम्बन्ध की कथा कहता है...
काश! इन धरोहरों को सहेज कर रखने का समुचित प्रयास भी हो...!
इस स्थान के बहुत पास ही रहते थे हम... अस्सी का किनारा... गौरवशाली इतिहास की अनुगूंज और इस सबके प्रति हमारी जब तब गहराती उदासीनता भी देखी है..., माँ गंगे का प्रवाह और लहरों में डगमग करती नौकाओं को खेते नाविक भी देखे... उनका अडिग विश्वास और संघर्ष भी देखा...
लहरें कहती हैं... बहाव जीवन है... गति न रुके तो वो सब हासिल हो सकता है जो अप्राप्य लगता हो किसी एक क्षण में...! लहरों की बातों पर विश्वास किये ही तो चले जा रहे हैं हम अजानी राहों पर... अजानी यात्राओं और गंतव्यों की ओर...
प्रवाह बना रहे... पवित्रता बनी रहे... गंगा बहती रहे... हमारी आस्था बनी रहे... जीवन बना रहे...!

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आशीष, आज आपका जन्मदिन है न... १५ अगस्त २००६ की वह शाम कभी नहीं भूलेगी... जुबानरी, जेनिटा दी, और हम सब साथ थे... वो शाम कितने रिश्ते जोड़ गयी न... आज भी अक्षुण्ण... !! सच, कई बार कुछ एक क्षण का परिचय ही हमें जीवन भर की निधि दे जाता है... जेनिटा दी याद आती हैं... उनकी भेजी राखी हमने यहाँ आने से पहले आपको बाँधी थी... वो क्षण भी याद आता है... कैसा संयोग था न... हम लास्ट जब मिले तो वो रक्षा बंधन का दिन था... शोर्ट नोटिस पर आप दीदी को विदा करने दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुँच आये थे... जेनी दी की भेजी राखी भी साथ लाये थे... २००९ की बात है न ये... तस्वीरें नहीं हैं तब की पर मन में तो सजीव होंगे ही वो पल... याद तो होगा ही न...!
जन्मदिन की अशेष शुभकामनाएं... खूब खूब आशीर्वाद... !!

1 टिप्पणियाँ:

Kailash Sharma 15 अगस्त 2015 को 12:07 pm  

यादों के झरोखे से कभी पीछे देखना बहुत अच्छा लगता है...शुभकामनाएं

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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