अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

दर्द और दवा... !

भाप से जल कर...
मन, रह गया, मचल कर...


ओह!
क्यूँ नहीं रहती तू संभल कर...
ज़िन्दगी! दे सज़ा
कर, फिर से, कोई छल कर...


फिर से बिखर...
और फिर फिर समेट खुद को...
जीत ले विडम्बनाएं...
संकल्पों के सांचे में ढ़ल कर...


ज़िन्दगी!
दौड़ते हुए सरपट...
कभी रुक जा तू, चिंतन की गली में भी,
पल भर...


हम
नहीं हारेंगे अँधेरे से...
हृदय से लग जायेंगे रौशनी के
कदम दर कदम चल कर...


सब समाधान कब मांगे हैं...


अरे! कुछ प्रश्नों को तो हल कर...
संभावनाओं के सांचे में ढ़ल कर...


ओह!
मन, रह गया, मचल कर...
भाप से जल कर...

तभी
अवतरित हुई दवा...
दुआ सी कविता बनकर... !!


2 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा... 28 अगस्त 2015 को 7:50 am  

छाले और दर्द .... कविता ही बनते हैं

कालीपद "प्रसाद" 28 अगस्त 2015 को 8:08 am  

sundar

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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