अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कथ्य आपका, कलम मेरी... !!


उठते गिरते... रोते सँभलते... चलते चलते अब अनुशील पर ५०० पोस्ट्स हैं... ये यात्रा कलमबद्ध हो... लौट कर आने को ऐसी जगह रच रही है निरंतर मेरे लिए... जिसका होना कभी कभी अनिवार्य सा जान पड़ता है... जब कहीं नहीं होता कुछ, तो अवलंब बनती हैं कवितायेँ ही... बीता हुआ कोई पल आस विश्वास बुनकर जीवन के प्रति आस्था दृढ कर जाता है... और लौट आते हैं हम... वापस जीवन की ओर...
जीवन! शुक्रिया तुम्हारा... तुम जो हो वो होने के लिए... !!
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हमारी प्लानिंग के अनुरूप सब होता तो आप यहाँ होते अभी... स्टॉकहोम में... हम यहाँ सेलिब्रेट कर रहे होते आपका "हैप्पी वाला बड्डे"... है न... ? उम्मीदों से भरी गुल्लक ख़ुशी ख़ुशी तोड़ कर उससे कितने सपने बुन लिए गए थे यहाँ... सब धराशायी...; कोई बात नहीं... फिर नयी गुल्लक ले आये हैं... नए शहर से... अब उसमें भरेंगे उम्मीदें...  बीतेगा समय और समय के साथ गुल्लक फिर भर जाएगी... अबकी बार समय भी शायद दे साथ और हमारी प्लानिंग सफल हो जाये... आपका यहाँ आना हो... आपके साथ इस शहर का आकाश देखें हमलोग...
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आपकी फ़ेसबुक कवर फोटो पर "नामालूम"जी की सुन्दर पंक्तियाँ उद्धृत हैं न...
[ रोज़ रोज़ गिर कर भी मुकम्मल खड़ा हूँ /
ज़िन्दगी देख मैं तुझसे कितना बड़ा हूँ ]
इसके आगे ऐसे ही कभी कुछ जुड़ गया था... आज पन्नों के बीच मिला... सहेज लेते हैं इधर फिर से :: कथ्य आपका, कलम मेरी...!


राहें तराशता
बढ़ रहा हूँ आगे...


औरों के लिए भी हो सफ़र आसां 

इस हेतु परिस्थितियों से लड़ा हूँ मैं...


कितनी ही हताश आँखों का नूर हूँ...
आस विश्वास बनकर
हर कठिन राह पर, हर किसी के लिए, खड़ा हूँ मैं...


ज़िन्दगी! देख तुझसे कितना बड़ा हूँ मैं... !!


Many many happy returns of the day, Bhaiyya... :)

5 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा... 16 अगस्त 2015 को 3:40 pm  

ललित जी को सादर शुभकामनायें

सुशील कुमार जोशी 16 अगस्त 2015 को 3:41 pm  

हमारी ओर से भी ललित जी को जन्मदिन पर शुभकामनाऐं ।

रचना दीक्षित 16 अगस्त 2015 को 5:18 pm  

ज़िन्दगी! देख तुझसे कितना बड़ा हूँ मैं..

बहुत सुंदर प्रस्तुति.

ब्लॉग बुलेटिन 16 अगस्त 2015 को 5:48 pm  

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, ख़बरों के टुकड़े - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

abhi 21 अगस्त 2015 को 9:06 am  

कुछ दिन देर से ही सही...हमारे तरफ से भी ललित जी को जन्मदिन की शुभकामनाएं! :)

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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