अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

...और यूँ दूर हो गए हम...?!!

बीतते रहे
क्षण...
दूर होते गए
हम...


ज़िन्दगी
कई पड़ावों से
होकर गुजरी...
अघाती रही
देख राहों में
भावों की मंजरी...


कभी खुशियाँ
अचानक मिल गयीं
कभी रहीं थोड़ी कम...
आँखें
वक़्त बेवक़्त
होती रहीं नम... 


कितने ही
एहसास
बुने...
वक़्त के
कितने ही
ताने सुने... 



किस किस चीज़ हेतु
राहों में
ललका मन...
कितनी बार रोया
और रो कर
हुआ हल्का मन...


कैसे कैसे
मंज़र
आये...
वक़्त ने
कैसे कैसे
खंज़र चुभाये... 


पर चलता रहा
जीवन का
क्रम...
रोज़ टूटता
और रोज़ बनता रहा
बना रहा भ्रम... 


इसी बीच
रुला गया ये ख्याल... 


कैसी
विचलित करने वाली है
ज़िन्दगी की यह चाल... 


क्यूँ
वो बीत गए क्षण...?
और यूँ दूर हो गए हम...?!! 

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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