अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कितने छली हैं ये एहसास भी...!

दूरी है
और है वो
पास भी...
कितने
छली हैं
ये एहसास भी...


हमने देखी
टूटती हुई
अंतिम आस भी...
ज़िन्दगी दूर नहीं थी
पर ये भी सच है
वो नहीं थी पास भी...


कहने को जीवित हैं
कि है जीवन
आती जाती सांस ही...
लय संगीत सब अधूरे
शोर है ज़िन्दगी
है कोई फांस ही...


कितने आधे हैं
कितने अधूरे हैं हम
पल पल रहे जिंदा यह एहसास भी...
दर्ज़ करता रहे समय
सारी उपलब्द्धियां
और गिनता रहे वह सकल ह्रास भी...



चलो,
जैसी हो
हंस कर स्वीकारते हैं तुम्हें,
अन्तःस्थितियाँ लड़ लेंगी अपनी लड़ाई
ज़िन्दगी! तुम लगी रहो
प्रस्तुत करने में परिस्थितियों का संत्रास ही...

खलते हुए सबको
खेलते खिलते हुए इन राहों में
हम कल बीता कल हो जायेंगे,
जाओ ले लो सब
अभी के लिए रहने दो
मेरे पास एक "काश" ही... ... !!









1 टिप्पणियाँ:

yashoda agrawal 16 अगस्त 2015 को 8:27 am  

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 17 अगस्त 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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