अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

सागर, नीलगगन और मन की उड़ान...!!


पहाड़ों की ऊंचाई से
देखना समंदर...
सुनना लहरों का शोर...


और देखना
विलीन होते हुए
समंदर को नीलगगन में
उस छोर पर...


कहाँ है
इस नीले और उस नीले के बीच की
विभाजन रेखा...?
हमने तो नहीं देखा...!


उस ऊंचाई से
महसूसना तट का कलरव...
सागर का अपार वैभव...


और...
स्मृति के गलियारों में
टहलते हुए...
पहुंचना
किसी खोयी हुई स्मृति तक
किसी गुज़रे हुए पल तक
किसी बीत चुके कल तक 



और देखना
जीवन को विलीन होते हुए
मृत्यु के आगोश में
किसी अजाने छोर पर...


किसे पता
कब आ जाये
विदा का सन्देश लिए कोई झोंका...


कहाँ है
जीवन और मृत्यु के बीच की
विभाजन रेखा...?
हमने तो नहीं देखा...!


धीरे धीरे
घटित होती है
हर पल मृत्यु... 


वैसे ही
जैसे
हर पल जीवन है 


सुख दुःख का ये कैसा अनूठा संगम है... !!



2 टिप्पणियाँ:

Onkar 15 अगस्त 2015 को 2:33 pm  

बहुत सुंदर

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 15 अगस्त 2015 को 5:24 pm  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (16-08-2015) को "मेरा प्यार है मेरा वतन" (चर्चा अंक-2069) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
स्वतन्त्रतादिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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