अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

पूरा चाँद... आधे अधूरे हम... !!


मैंने चाँद को देखा... वो निर्निमेष जैसे मुझे ही निहार रहा था... या शायद मेरी उसकी ओर एकाग्र दृष्टि ये आभास करा रही थी...! जो भी हो, दोनों ही विकल्पों में से जो भी सत्य रहा हो, है तो यह एक सुन्दर संयोग ही... कि ऐसा रोज़ नहीं होता... रोज़ संभव ही नहीं कि ज़िन्दगी दे इतना अवकाश कि दसवें फ्लोर की खिड़की पर बैठा मन चाँद को निहार सके... कितनी ही कही अनकही बातें कह सके चाँद से... और आश्वस्त भी हो मन कि दूर गगन का चाँद सुन भी रहा है सब बड़ी तन्मयता से...
ये कल्पना... ये आस्था... ये विश्वास... ये पागलपन सी प्रतीत होने वाली बातें... और ये अनुभूति रोज़ कहाँ संभव है... !! कभी कभी घटित होता है यह दुर्लभ संयोग, रोज़ नहीं आता गगन के हिस्से पूरा चाँद और न ही हर रोज़ आसमान भी नील वर्ण का होता है... नीला रंग मुरली वाले का ही विस्तार है... पीताम्बरधारी प्रभु की असीम कृपा का रूप है... तभी तो "होकर भी न होने वाले" आसमान का रंग है... दिखाई तो देता है पर आसमान का वास्तव में कहाँ है वजूद... हवा नहीं दिखती, पर है वो... ईश्वर की लीला अपरम्पार है... इसे समझ पाना कहाँ हमारे वश में...!
कहाँ से कहाँ चली जाती है कलम, उसे जो लिखना है लिखे... हम कर्ता भाव से छूट कर बस अपना कर्म करें... शेष तो भवसागर है यह... यहाँ न दुखों का अंत है न ही संभावनाओं का... तो चलता चले जीवन वैसे ही जैसे चाँद चलता है गगन में... घटता बढ़ता... नित निरंतर...

चाँद!
तुमसे कहते हुए
आश्वस्त हूँ...

कि...
तुम जानते हो
घटते बढ़ते रहने का दर्द...

समझोगे तुम...
हमारी पीड़ा...

कि हम इंसानों के भी
जो हिस्से आया
सब आधा अधूरा है...

हमारा अस्तित्व
कहीं से भी
नहीं पूरा है...

हम सब
अपने अपने परमेश्वर से
बिछड़े जीव हैं...

एक ज़िन्दगी मिली है
और वह भी
क्षणिक निरीह है...

तमाम अधूरेपन
और कालिमा के होते हुए
तुम कवियों की कल्पना हो...

हम सबकी प्रेरणा हो...

वैसा ही हौसला हमें भी देना...
चाँद! यूँ ही चमकते रहना... ... ... !!



1 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा... 30 अगस्त 2015 को 10:47 am  

खुदा कहो या प्रकृति
दर्द को हर दिन भोगता है
कभी दर्द अप्रतिम सुन्दर
कभी सुख के लिए वक़्त नहीं …
क्या है सुख क्या है दुःख
एक ही सिक्के के दो पहलू

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