अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

आना-जाना...!


जाने को उद्धत हो न
चले जाना...


कौन रोक सका है समय को...
किसने बांधा धारा को...
ये बेकार ही न जिद्द ले बैठते हैं कि आधे आधे न हों हम
जो हो वो सारा हो...


सब तो बिखरन ही है यहाँ
फिर हम कैसे साबूत बच जायेंगे...
जाना है न... जाओ...
दरके हुए हैं टूट ही जायेंगे...


पर इससे क्या
जो है सो है नियति यही है
क्या सोचना व्यर्थ
सारी बात तुम्हारी अक्षरशः सही है 


गति का नाम जीवन है
पर कभी कहीं रुक जाना भी जीवन ही होता है
कभी कभी जीतते जीतते हार जाने का भी मन होता है... !! 

1 टिप्पणियाँ:

Anita 21 अगस्त 2015 को 10:47 am  

थम जाना पूरी तरह से महाजीवन को जन्म देता है..

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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