अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

उसने कहा --


बहुत
बेचैन था मन


बेहद
उदास थे हम


कविता की ऊँगली थामी
वो कहती रही, हम बस भरते रहे हामी 



उसने कहा -- 


हो जाओ
गुम
कोरे कागज़ पर
बस
लिखकर


"तुम" 

1 टिप्पणियाँ:

abhi 21 अगस्त 2015 को 9:03 am  

क्या खूबसूरत ! :)

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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