अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

हो सके तो...!

मन का पंछी...
जीवन का आकाश...
धरा की बेचैनियाँ...
और समंदर!


समंदर के अथाह में तैरती
आस विश्वास की
तसल्लियाँ... 


धैर्य की अनगिन मछलियाँ...!


तटों पर एक बार हो आओ...
मन! हो सके तो समंदर हो जाओ...!!

3 टिप्पणियाँ:

abhi 21 अगस्त 2015 को 9:02 am  

मन! हो सके तो समंदर हो जाओ...!!
Ahaaa...Lovely!

Anita 21 अगस्त 2015 को 10:45 am  

सुंदर प्रार्थना..

Shanti Garg 23 अगस्त 2015 को 12:03 pm  

सुन्दर व सार्थक रचना ..
मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका स्वागत है...

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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