अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

तुम...

तुम
नेह हो...


तुमसे मिलती है प्रेरणा...

कितनी ही बार
डूबती हुई आस को
तुमने ही बचाया है... 


तुम कभी नहीं जान पाओगे
कि क्या हो तुम मेरे लिए...


ठीक वैसे ही जैसे कभी न जान पाऊं मैं शायद
कि क्या हूँ मैं तुम्हारे लिए...


शायद
अभिन्नता ऐसे ही
एक दूजे को पहचानती हो...
बिन पहचान

अनसुना अनकहा सब

अंतर्यामी सा जानती हो...


पता है... ?


कितनी ही बार
आंदोलित हुआ है हताश मन
कितनी ही बार
उठ खड़ा हुआ है जीवन


केवल तुम्हारे पास होने के एहसास से


क्या कहूं इसे... ?


मैं इसे
ईश्वरीय प्रताप से
जोड़ देती हूँ...


दिशा का संज्ञान
सौंप तुम्हारे हाथों में...


तुम्हें नाविक समझ लेती हूँ
और फिर निश्चिंत हो
अपनी जीवन नाव खेती हूँ... !!


3 टिप्पणियाँ:

Anita 4 अगस्त 2015 को 7:04 am  

यह भरोसा ही तो जीवन की सुगंध है..

Upasna Siag 4 अगस्त 2015 को 10:41 am  

तुम्हें नाविक समझ लेती हूँ
और फिर निश्चिंत हो
अपनी जीवन नाव खेती हूँ... !!

रचना दीक्षित 5 अगस्त 2015 को 5:44 pm  

दिशा का संज्ञान
सौंप तुम्हारे हाथों में...

तुम्हें नाविक समझ लेती हूँ
और फिर निश्चिंत हो
अपनी जीवन नाव खेती हूँ... !!

बेहतरीन भाव, सुंदर कविता.

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