अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

हो सके तो यकीं करना...!

तुम यकीं नहीं करोगे
हमें पता है...


पर हो सके तो यकीं करना...


यहाँ की सुबहों में उजाला नहीं है
बस इसलिए
कि तुम्हारी मुस्कराहट
कितने दिन हुए
नहीं दिखी...


उजाला क्या?
यहाँ तो सुबह ही नहीं होती...


रात ही रात है...
बोलो, ये भी कोई बात है...!


कभी-कभार तो
हो ही जानी चाहिए न सुबह...
ऐसे कैसे चलेगी ज़िन्दगी
कोई तो होनी चाहिए न वजह...


सूरज बन कर
उग आओ न...
हमने कब से बढ़ा रखा है
तुम भी हाथ बढ़ाओ न...


हाथों में
हाथ होगा...
देखना, गोधुलि की इस बेला में
दिन और रात का साथ होगा...


तुम
एक मुस्कराहट दे जाना...
जाते जाते
मेरी सारी दुनिया हो जाना...


तुम्हारे लिए


हमने अपने हाथों से
कागज़ पर
रंगों से
सूरज बनाया है...


पता है
एक फूल भी
रंगों ने मिल कर
खिलाया है...


पत्थरों पर
की है चित्रकारी...
ये सब
प्रेरणा है तुम्हारी...


प्रार्थना यही है
पल पल...
जीवन हो
बहता जल...


उस निर्मल धारा संग
तुम भी बहना...
यूँ ही मन के बागों को
सुवासित किये रहना...


हम माटी को सर माथे लगायेंगे
देखना, आस्था के दीप जगमगायेंगे... !!

5 टिप्पणियाँ:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 22 अगस्त 2015 को 12:45 pm  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (23-08-2015) को "समस्याओं के चक्रव्यूह में देश" (चर्चा अंक-2076) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

रचना दीक्षित 23 अगस्त 2015 को 9:53 am  

हम माटी को सर माथे लगायेंगे
देखना, आस्था के दीप जगमगायेंगे... !!

आशा ही आगे बढ़ने का हौसला देती है. सुंदर प्रस्तुति.

Onkar 23 अगस्त 2015 को 1:30 pm  

उम्दा रचना

Anita 24 अगस्त 2015 को 10:50 am  

सुबह तो कब की हो चुकी है..हमारी ही आँखें बंद हैं

Asha Joglekar 29 अगस्त 2015 को 2:39 am  

सारी टूटन बिखरन समेट कर फिर बढ़ चलो... कि गति ही जीवन है... लहरें किनारों पर बार बार टकड़ा कर यही तो दोहरा रही है... ज़िन्दगी बही जा रही है... जिजीविषा के गीत गा रही है... !
सुंदर संदेश देती कविता।

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