अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

वो तुम्हें अपना कहेगी... !!

प्रतिविम्बों में,
ढूंढ़ी हमने ज़िन्दगी...
मन ही मन,
चलती रही बंदगी...


प्रतिपल प्रतिक्षण,
रौशनी ठगती रही...
अँधेरे को जीतना था,
कविता जगती रही...


वो भी है
मझधार की सगी...
जो नाव
किनारे है लगी...


सुबह
फिर से
चल पड़ेगी...

तुम कहो न कहो
वो तुम्हें
अपना कहेगी... !!


क्या कहें,
कितना रोता है...
किन किन बातों पे,
दिल उदास होता है...


हारता है, गिरता है,
पुनः उठता है...
शुक्र है, मन से मन का रिश्ता
कभी नहीं टूटता है...


बस कुछ क्षण के लिए ही
सूरज ओझल है...
बदल जाएगा
जो ये माहौल बोझिल है...


ये घना अँधेरा
कहता है--
सुबह होकर रहेगी...


तुम कहो न कहो,
वो तुम्हें
अपना कहेगी... !!



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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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