अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

ये साथ है अनूठा...!!


तालों से पटा पुल...


समय सहेजता है
आस्था के अनगिन फूल...


साथ की परिभाषा जाने क्या होती है...
जाने क्या होता है प्रेम...


ताला लटका रह जाता है अंकित नामों का विम्ब बनकर
और ताले की अभिन्न
चाभी
फेंक दी जाती है
अथाह जल में
हमेशा के लिए ताले से जुदा हो जाने को
खो जाने को...

***

ताले और चाभी का दर्द
चुभने लगा बन कर शूल 


तभी कह उठे दोनों -- 


"जाने दो...
बातें ये निर्मूल...

ये साथ है अनूठा...
कि हम औरों के लिए कुर्बान हुए...
प्रेम की प्रतिमा की हम चरण धूल...!!"

*** *** ***
तस्वीर :: Pedestrian bridge named "Passarelle des Arts" which crosses the River Seine 

4 टिप्पणियाँ:

ब्लॉग बुलेटिन 18 अगस्त 2015 को 11:50 am  

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, सबकी पहचान है , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Kailash Sharma 18 अगस्त 2015 को 12:06 pm  

अद्भुत और गहन अभिव्यक्ति...

Anita 19 अगस्त 2015 को 6:12 am  

ताले चाबी की यह दास्ताँ अनोखी है

abhi 21 अगस्त 2015 को 9:04 am  

ये तस्वीर और इसके बारे में पहली बार पूजा के ब्लॉग या फेसबुक पर पढ़ा था...
और कविता....वो तो बेहद प्यारी !

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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