अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

अनचीन्हे... अनजाने द्वीप...!!

हों जलते हुए दीप,
दिल हों समीप...!
फिर रौशनी ही रौशनी है,
जो
संग सद्भावों के हों
मोती... सीप...!!


मन के आँगन को,
फिर से दिया लीप...!
साफ़ सुथरी हो गयी माटी,
ये जाना--
हम सब हैं
सागर मध्य खोये हुए द्वीप...!!


नियति
ले आती है समीप...!
लहरें एक से दूसरे का दर्द जोड़े हैं,
तभी तो जुड़ जाते हैं न
कभी प्रत्यक्ष न मिल पाने वाले
अनचीन्हे द्वीप... अनजाने द्वीप...!!



*** *** ***

बाल्टिक सागर के मध्य द्वीपों को देखते हुए... स्मरण करते हुए एक यात्रा को...


 

4 टिप्पणियाँ:

Jitendra tayal 27 जून 2015 को 4:17 am  

अतीव सुन्दर

ब्लॉग बुलेटिन 27 जून 2015 को 12:05 pm  

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, काम वाला फ़ोन - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 27 जून 2015 को 1:20 pm  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (28-06-2015) को "यूं ही चलती रहे कहानी..." (चर्चा अंक-2020) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

रचना दीक्षित 29 जून 2015 को 8:45 am  

अनुपमा जी प्रकृति को बेहद ही करीब से देख रही हूँ आपकी इस पोस्ट के जरिये

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
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आज कैसे
अनायास आ गयी
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अरे! एक युग बीता...
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इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
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अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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