अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

बार्सिलोना यात्रा संस्मरण: कुछ चित्र कुछ अनुभूतियाँ...

जीवन ही यात्रा है... जाने अगले पल क्या घटित होना है किसे पता... हर क्षण अपने भीतर कोई न कोई आश्चर्य लिए ही प्रकट होता है... बस कभी हम महसूस कर पाते हैं उस आश्चर्य को... उस चमत्कार को... तो कभी वह लम्हा... अनदेखा अनजीया ही बीत जाता है... इस क्षण हम जिंदा हैं... यही क्या कम आश्चर्य है...! मृत्यु कभी भी कहीं भी किसी भी तरह हो सकती है... ऐसी अनिश्चितताओं के बीच सांसें चल रही हैं इस क्षण तो ये भी तो किसी आश्चर्य से कम नहीं... इस क्षण को धन्यवाद तो कहना ही चाहिए... इस क्षण का यह उपकार हमें कभी नहीं भूलना चाहिए और फिर इसी तरह हर आने वाला पल हमारी कृतज्ञता का साक्षी बने... जीवन निश्चित सुन्दर है... उसके होने का उत्सव होना ही चाहिए... उसका धन्यवाद किया ही जाना चाहिए...!

कई दिनों से स्थगित होता रहा  है लिखना... यात्रा संस्मरण प्रारंभ तो कर दिया था... एक पोस्ट लिखी भी लेकिन फिर यूँ उलझे कि सुलझे ही नहीं... उलझनें तो अब भी हैं पर जीवन एक और यात्रा की ओर ले जा रहा  है तो मन को किसी तरह बाँध कर लिखने बैठे हैं कि अगली यात्रा को निकलने से पूर्व पिछली यात्रा को तो लिख जायें... कि दर्ज़ हो जायें हमेशा के लिए कुछ अनुभव... टिक जाये चित्रों में कुछ लम्हे जो सदा स्मृतियों में जगमगाते रहेंगे...! समय है न... निर्दयी है बड़ा... बहुत डर लगता है... जाने कब क्या मिटा दे... तो बस बालसुलभ प्रयास ही है भोला सा हमारा कि हम बचा लेंगे खुशियाँ... हम बचा लेंगे स्मृतियाँ... और ये भी कि बचा लेंगे हम रेत पर अपने बनाये महल... ये जानते हुए भी लोज़िकली ये संभव ही नहीं... न खुशियाँ टिकती हैं... न स्मृतियाँ ही... और रेत के महल कब टिके हैं भला! खैर, कुछ भ्रम बने रहे तो ही जीवन चलता है... तो कुछ भ्रम गढ़ते हुए... अपना ही मन पढ़ते हुए चलते हैं कुछ देर यहाँ... क्या पता यात्रा संस्मरण भी कुछ आकार ले ले...!
शुरू करते हैं चित्रों से और वहीँ से कोई सिरा पकड़ कर कुछ अनुभूतियाँ... कुछ तथ्य और कुछ मुस्कानें आंसुओं की जमीं पर से चुरा कर साथ सहेजने का प्रयास करते हैं...



सग्रादा फैमिलिया एक रोमन कैथोलिक गिरजाघर है... यह अनतोनी गौदी द्वारा निर्मित है और अभी तक निर्माण कार्य अग्रसर ही है...! इस स्थान पर बहुत समय बिताया हमने पर अन्दर प्रवेश नहीं  ही कर सके समयाभाव के कारण क्यूंकि इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य तो मामा मामी से मिलना ही था... अगली बार के लिए छोड़ दिया हमने इस ईमारत के भीतर जाने की इच्छा को... कुछ अधूरा रहे तभी तो लौट आने की आस बंधती है... फिर जायेंगे इस दिव्य ईमारत के अवलोकनार्थ... शायद इसी छुट्टी में...! कलाकार की गहरी अंतर्दृष्टि ने कैसे कीर्तिमान रचे हैं उसका अनूठा उदहारण है यह पावन  स्थल!
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ये बार्सिलोना की एक सुन्दर सुनहरी शाम थी... अपने देश से इतनी दूर परिवार का साथ... ये अनोखे खुशियों के क्षण थे... पहली बार मिलना पहली बार मिलने की तरह नहीं था... ऐसा लगा जैसे कितनी ही बार मिल चुके हों पहले से... बड़े मस्ती में बीते पल... लिखने लगे तो कितने ही पन्ने कम पड़ जायेंगे... खूब सारी मस्तियाँ... खूब सारी बातें समेटते हैं फिर कभी... कि लिख जाना है... कुछ एहसासों को जिनके लिए मन सदैव तरसता है...!
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ऊँचाई से यूँ नज़र आता है शहर... जल थल नभ सब साथ ही दृश्यमान... सब साथ ही उपस्थित... जीवन की रागिनी गाते हुए... संग संग गुनगुनाते हुए...! बादलों की चिर परिचित उपस्थिति ने जल थल नभ जैसे सबको जोड़े रखा था... मनोरम था सबकुछ...!
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बार्सिलोना ऑलंपिक पार्क और ग्राउंड भव्य थे... खूब अच्छा समय बिताया हमने यहाँ तसवीरें क्लिक करते हुए...! आसमान पर कई गलत सही के निशान उकेर रखे थे बादलों ने... जो था सब बढ़िया था... विस्तार अगली पोस्ट में... क्यूंकि अब विराम लेना आवश्यक है कि अगली यात्रा पर निकलने का वक़्त हो गया है...!
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ये हम हैं... रेत पर खेलते हुए... समुद्र में भींगते हुए... एक अनकहे से अकेलेपन से जूझते हुए... पत्थर चुनते हुए... लहरों का संगीत सुनते हुए... धुंधले धुंधले से हम...! तत्वतः हम सब अकेले ही तो हैं... अकेले ही तो होते हैं... भीड़ में... साथ में... और हाथों में हाथ लिए हुए भी... के हमारी अनुभूतियों का फ़लक हमेशा जुदा होता है... हम हमेशा साथ होते हुए भी अकेले ही होते हैं जीवन के अरण्य में...! भावों के विस्तृत सागर में कभी ये दर्द दिव्य अनुभूति लिए होता है... और कभी होता है दर्द की कहानी भी...!
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बहुत कुछ शेष है सहेजा जाना... लिखा जाना... वो फिर कभी... अब उठें खुद को समेटें अगली यात्रा के लिए... पाँव में चोट है... हाथ भी जला है... और भी कई तरह की टूट फूट है भीतर बाहर... सब समेट कर निकलना है भटकने... शायद चलते रहना ही हर टूटन का उपचार हो... यात्रा ही सिखाएगी जीवन के नए अर्थ... और जोड़ेगी पुनः उस से... उन लम्हों से जो पीछे छूट गए... पोलैंड, प्राग, बुडापेस्ट... और भी कुछ एक पड़ाव... ढेर सारी तस्वीरों और कहानियों के साथ मिलते हैं कुछ अंतराल के बाद...!

3 टिप्पणियाँ:

Rakesh Pathak 8 जून 2015 को 7:13 am  

यात्रा एक शून्य से खींची हुई दूरी है
और गति है प्रस्थान का गीत।
इन गीतों में छुपे है रहस्य जीवन के।
अंतहीन राहों पर ही बजते है इनके संगीत।
सफ़र से ही पाता है राही एक मुक़ाम
वही इक ठिकाना वहां पे ही शून्यकाम
तुमसब की यात्रा सुखद हो। जीवन के कठिन सूत्रों का सार तुम्हें इन यात्राओं में मिलता रहे। जीवन जिंदादिली से जीने का हुनर भी ईश्वर तुम्हें निरंतर देते रहे। ऊर्जावान रहो।

Tapasya Chaubey 11 जून 2015 को 3:51 am  

Bhut hi achhi rachna yatra ki .maine Netflix pe dekha thi is church Ke banawat ke baare me ,per khana padega aapke sabdo me bhi kam rachna nhi hai :)

Onkar 13 जून 2015 को 5:20 pm  

सुन्दर वर्णन, सुन्दर चित्र

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