आड़ी तिरछी रेखाएं!

हम सभी वस्तुतः एकाकी द्वीप हैं, एक दूसरे से अलग... एक दूसरे से दूर अपने अपने एकांत को जीते हुए... किनारों पर लहरों का टकराना थाहते हुए. हम सब ऐसे ही बिंदु हैं बड़े से समुद्र के विस्तार में... अलग हैं, अथाह जलराशि बीच में बहती है और एक से दूसरे तक जाना हो तो नाव का सहारा लेना होता है. नाव भी नहीं मिलती हर बार, कभी होती भी है तो खेवैया नहीं होता! 

हर द्वीप पर हरे रंग का दर्द उगा होता है जो अलग होते हुए भी आपस में जुड़ा होता है, जो धार दो द्वीपों के किनारे से टकराती है कभी कभी वह भी एक ही होती है और सारे सन्देश वैसे ही एक जगह से दूसरी जगह पहुंचा देती है, एक द्वीप दूसरे से यूँ भी जुड़ा होता है कि एक का दर्द दूसरे की आँखों से बहता है. पर ये बातें सब नहीं समझ सकते, समझे भी कैसे, सबने कहाँ देखा होता है समंदर को यूँ, सबने कहाँ देखी होती है... महसूस की होती है द्वीपों के बीच की अबोली स्नेहसिक्तता, सब इतने पागल थोड़े ही होते हैं कि सारा काम छोड़ कर सागर में बसे एकाकी द्वीपों को यूँ कल्पित कर ये आड़ी तिरछी रेखाएं जोड़ें...

हम सारी दुनिया से दूर, थल से कटे हुए बैठे थे अपने साथ और बीच सागर में अपने चहुँ ओर जल ही जल देख कभी विस्मित होते थे, कभी अभिभूत तो कभी थल से दूरी घबराहट का कारण भी बनती थी. ऐसे में कोई द्वीप नज़र आता था तो राहत का अनुभव होता था और दो द्वीपों के बीच लहरों का आना जाना देख आँखों में भी समंदर लहरा जाता था...! नीले अम्बर और नीले समंदर के विस्तार में ये कुछ थल के भ्रम सुकून दे रहे थे... उन पत्थरनुमा थलों पर उगा हरापन कुछ घाव भी हरे कर रहा था और साथ ही मन के किसी कोने में अपनी परछाईं से आश्वस्त भी कर रहा था. नीला रंग ही तो सृष्टि का विस्तार है... और इस विस्तार में प्रभु ने जैसे जान बूझ कर हरा रंग डाला है, कि कुछ घाव हरे रहेंगे तो उसकी याद बनी रहेगी... धरती खिली रहेगी और धरती की खुशियाँ और गम फूल पत्तों में लहलहाते रहेंगे! 

जो भी हो, नीलेपन के विस्तार में कुछ हरा होना ही चाहिए... अथाह सागर में सुख दुःख के कुछ द्वीप होने ही चाहिए जो आपस में बात करते हों... जिनकी ट्यूनिंग कुछ ऐसी हो कि कहने सुनने से परे बातें संप्रेषित हो जाएँ!

बाल्टिक सागर में कई बार यात्रा की है, इस बार फ़िनलैंड जा रहे थे. पहचानी सी डगर होती है पर सागर हर बार कुछ नयी अनुभूतियाँ दे जाता है या यूँ कह सकते हैं मन के मौसम के अनुरूप ही रूप धर अनुभूति के धरातल पर उग आता है... 

***

सागर के साथ होना शायद सागर होने जैसा ही कुछ है तभी तो न चाहते हुए भी लिख जा रहे हैं बिना ओर छोर के, इसे सागर की बेतुक लहरें ही समझा जाए... जाने क्यूँ बार बार आती है किनारे से टकराती है और फिर आती है फिर वही किस्सा दोहराती है!


15 टिप्पणियाँ:

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ 31 अगस्त 2013 को 8:00 am बजे  

क्या बात वाह!

कौशल लाल 31 अगस्त 2013 को 10:53 am बजे  

ये अनुभूति सभी को कहा प्राप्त होती है ,कुछ भींग कर भी उसे सुखाने में ही उलझे रह जाते है……

Anita 31 अगस्त 2013 को 11:16 am बजे  

सुंदर चित्रों के माध्यम से सजीव होता यात्रा विवरण..सागर की लहरों सा उन्मुक्त !

ओंकारनाथ मिश्र 31 अगस्त 2013 को 12:59 pm बजे  

बहुत अच्छा लिखा है. सागर में जाकर मैं बिलकुल शांत हो जाता हूँ. सिर्फ पानी और पानी और पानी ....

महेन्‍द्र वर्मा 31 अगस्त 2013 को 12:59 pm बजे  

@ अथाह सागर में सुख दुःख के कुछ द्वीप होने ही चाहिए जो आपस में बात करते हों... जिनकी ट्यूनिंग कुछ ऐसी हो कि कहने सुनने से परे बातें संप्रेषित हो जाएँ!
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बहुत गहरी बात !
इस ‘ट्यूनिंग‘ के बिना संप्रेषण संभव ही नहीं।

विभा रानी श्रीवास्तव 31 अगस्त 2013 को 4:24 pm बजे  

निशब्द हूँ
बस इसलिए इसे ले जा रही हूँ

प्रवीण पाण्डेय 1 सितंबर 2013 को 7:50 am बजे  

सब सागर से घिरे हुये हैं, बीच पड़े सब द्वीप एकाकी
बहुत सुन्दर

Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून 1 सितंबर 2013 को 8:06 am बजे  

... फि‍र भी जुड़ने की कोशि‍श तो करते हैं लोग

ANULATA RAJ NAIR 1 सितंबर 2013 को 9:37 am बजे  

हर द्वीप के दर्द का रंग एक सा....
सुन्दर वर्णन...

अनु

Onkar 1 सितंबर 2013 को 10:58 am बजे  

सुन्दर चित्र. सुन्दर प्रस्तुति

Dr ajay yadav 1 सितंबर 2013 को 1:37 pm बजे  

खूबसूरत यात्रा संस्मरण |फोटो बहुत खूबसूरत हैं |

वीना श्रीवास्तव 1 सितंबर 2013 को 4:36 pm बजे  

बढ़िया प्रस्तुति...

Madan Mohan Saxena 2 सितंबर 2013 को 11:08 am बजे  

सुन्दर ,सरल और प्रभाबशाली रचना। बधाई।
कभी यहाँ भी पधारें।
सादर मदन
http://saxenamadanmohan1969.blogspot.in/
http://saxenamadanmohan.blogspot.in/

Unknown 7 सितंबर 2013 को 7:33 pm बजे  

हम सभी वस्तुतः एकाकी द्वीप हैं, एक दूसरे से अलग....बेहतरीन फरमाया,.... रेल कि पठरिया सामानांतर चल रही है एक ही दिशा में मगर जुदा जुदा

shobha mishra 8 सितंबर 2013 को 8:41 am बजे  


सागर के भीतर की ख़ामोशी और लहरों के कोलाहल को मन से जोड़कर शांत भाव से सुन्दर शब्दों में पिरोया है आपने ..

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