अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

तुम अप्रतिम गीत हो...!

हे मीत! हे सखे!
तुम सांध्यगीत हो...
हारती रही हूँ सदा से मैं
तुम मेरी जीत हो...!


जीवन
बहुत कठिन है बंधू...
तुम इस नीरवता में
मेरे लिए जीवन गीत हो...! 


मत चले जाओ
यूँ बिसार कर...
नहीं बचेगा कुछ भी शेष
कि तुम मन से मन की प्रीत हो...!


भाव भाषा का
अद्भुत अविरल नाता है
कल्पना से परे हैं तुम्हारे सद्गुण
तुम कल्पनातीत हो...!


हे ईश्वर! हे सखे!
हे मीत...!
तुम सदा सदा से... सदियों से...
सुन्दर अप्रतिम गीत हो...!


हारती रही हूँ सदा से मैं...
हाँ तुम मेरा अभिमान... तुम मेरी जीत हो...!


5 टिप्पणियाँ:

cseabhi 8 जून 2015 को 3:31 am  

Bahut bahut sundar kavita. Main to kuch der tak iske shirshak pe hi atka raha tha! :)

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 12 जून 2015 को 2:02 pm  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (13-06-2015) को "जुबां फिसलती है तो बहुत अनर्थ करा देती है" { चर्चा अंक-2005 } पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

Onkar 13 जून 2015 को 12:24 pm  

बहुत सुन्दर रचना

मन के - मनके 13 जून 2015 को 5:42 pm  

बहुत पवित्र,बहुत सुंदर
हे ईश्वर!
हे सखे!
तुम ही केवल
मेरा संबल हो!

रश्मि शर्मा 13 जून 2015 को 7:59 pm  

हारती रही हूँ सदा से मैं...
हाँ तुम मेरा अभिमान... तुम मेरी जीत हो...बहुत सुंदर

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