अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

बार्सिलोना यात्रा संस्मरण: एक टूटी फूटी सी शुरुआत...



टूटे फूटे गए थे... और भी टूट फूट के साथ लौटे हैं... पर सुकून भी है कुछ कुछ साथ... उलझनें हैं घेरे हुए... पर ये विश्वास भी है कहीं न कहीं कि सुलझा लेंगे सब कुछ धीरे धीरे...! कितने समय बाद निकलना हुआ घर से... मामा जी की यूरोप यात्रा ने हमें भी स्टॉकहोम से निकल कर कुछ एक सुनहरे पल उनके साथ बिताने का अवसर दिया...! बीस दिनों की उनकी यात्रा में... हम उनके साथ एक दिन के लिए शामिल हो पाए बार्सिलोना में... पहली बार मिले हम मामी जी से और मामाजी से दूसरी बार... सच, मन मिल जायें तो ये पहली बार मिलना ही यूँ अभिन्न बना जाता है कि भींग जाती है भावों की उर्वर धरा और अंकुरित होते हैं जीवन के प्रति आस्था के बीज...!!!
ये जाने कैसी यात्रा थी... चार दिन और अनुभव इतने सारे कि लिखते हुए लिखते ही चले जायेंगे... आँखों में आंसू लिए गए थे... राह में कई धुनें मिली हवाओं में बिखरी हुई... नम होती रहीं आँखें... कई बार आद्र हुआ मन... फिर मामा मामी के दर्शन ने सुनहरी किरण को हमारे साथ कर दिया और किरण को साथ लिए हँसते खिलखिलाते हम खूब घूमें...
अभी  थोड़े  टूटे  फूटे  हैं  हम  तो  लिखने में  भी वह  प्रवाह  नहीं  हो पा रहा कि  मन में शब्द भाव तो हैं पर उन्हें लिखने वाले हाथ अशक्त से प्रतीत हो रहे हैं... इसलिए आज बस कुछ टूटी फूटी सी शरुआत कि बार्सिलोना यात्रा को होना है दर्ज इससे पहले की वह बिसर जाए...



यात्रा में होना
महज
नयी जगह तक पहुँचने की
ललक नहीं है...


यात्रा में होना
पल पल अपने आप को टटोलना भी है...
कई जगह
ये देख हतोत्साहित होना भी...
कि ऐसे भी टुकड़े हैं धरती के
जिनके ऊपर फ़लक नहीं है...


फिर होना आश्वस्त
कि हैं न बादल
ढक लेंगे...
और आसमान होने का भ्रम देंगे...
इस सहारे
ज़िन्दगी...
कुछ डेग चलेगी,


खलती है...
कुछ न कुछ तो होगा हर कदम
जब कमी खलेगी...


हो भी क्यूँ न...?
आख़िर उस परमेश्वर का अंश होकर भी
हममें उसकी झलक नहीं है...???... ...!!!

4 टिप्पणियाँ:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 24 मई 2015 को 1:59 pm  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (25-05-2015) को "जरूरी कितना जरूरी और कितनी मजबूरी" {चर्चा - 1986} पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

Dev K Jha 24 मई 2015 को 4:35 pm  

हम जब भी घूमनें जाते हैं तो फ़िर समय के हर मिनट की प्लानिंग करते हैं न... यह तो बहुत अच्छा अनुभव लगा... पूर्ण यात्रा वृत्तांत का इंतज़ार रहेगा।

आज की ब्लॉग बुलेटिन बी पॉज़िटिव, यार - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ...
सादर आभार !

Kavita Rawat 25 मई 2015 को 9:58 am  

बहुत अच्छा। . यात्रा की कुछ फोटोज भी होती तो हम भी इसी बहाने देख लेते। ।

रचना दीक्षित 25 मई 2015 को 2:45 pm  

आप तो अकेले ही घूम आयीं हमें भी घुमाइए अपने शब्दों के माध्यम से

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