अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

क्षणिक जीवन का शाश्वत खेल...!

दूरियों  के मानक
नम करते रहे मन प्राण अंतर...
जीवन चलता रहा समानांतर... 


वैसे ही 

जैसे चलती हैं 

रेल की पटरियां...

एक निश्चित दूरी बनाये हुए


कि... 

पहुँच सके गंतव्य तक रेल

पटरियों की यात्रा अनंत तक है
शायद वहां वे मिलें
चलता ही रहना है क्षणिक जीवन का शाश्वत ये खेल...!! 


साथ हँसते हैं साथ रोते हैं

मिलते कभी नहीं
पर साथ होते हैं… 


वैसे ही 

जैसे होती हैं 

रेल की पटरियाँ...


जो दौड़ती तो साथ  हैं
पर एक दूसरे तक
कभी पहुँच नहीं पाती हैं

जीवन के जाने कैसे हैं रास्ते
भ्रम और सत्य की आँख मिचौनी में
ज़िंदगी ही ठगी सी रह जाती है...!! 


0 टिप्पणियाँ:

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग के बारे में

"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

ब्लॉग से जुड़िए!

कविताएँ