अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

स्नेह की छाँव...!


ये एक उदास सी सुबह है... आसमान में खूब सारे काले बादल हैं... तीन बजे का आकाश कुछ कुछ रौशनी बिखेर रहा है... जरा बुझा बुझा सा... कि शायद रात भर रोया है अम्बर... अब रुदन कहें या बारिश ये तो हमारे मन के मौसम की बात है... उदासी इस बारिश को रूदन कह देती है... वहीँ धुली धुली सी धरती को देख मन रुदन नहीं कह पाता बारिश को... वह इसे धरती के प्रति आसमान का नेह कह उठता है... आसमान धरा की खातिर ही तो बरसता है न... जो भी लिया उसने वह वापस लौटा देता है... बादल पुनः पुनः अपना स्वरुप त्याग धरा के हो जाते हैं... फिर से आसमान में बादल बनकर लौट जाने के लिए... ये तो क्रम है... चलता है चलता ही रहेगा...!

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काश! होते घर पर... अभी भारत में कुछ सात बजने को होंगे... मम्मी पापा से बात हुई... आज एनिवर्सरी है उनकी... ३६वीं सालगिरह... वहां होते तो साथ मंदिर जाते... फूल सजा कर देते उन्हें... पूरा जीवन तो मात पिता बच्चों के जीवन को फूल की तरह खिलाने में ही गुजार देते हैं... ईश्वर ने माता पिता का हृदय ही ऐसा बनाया है कि त्याग तपस्या वहां स्थान पाकर स्वयं को धन्य समझते हैं... 

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अभी अभी बीती है माँ पिताजी की भी एनिवर्सरी... २७ मई... जाने कहाँ खोये थे हम... ये दिन विस्मृत हो गया था... २८ को विश किया... उनकी ४३ वीं सालगिरह थी... वहां  होते तो अपनी तरह से सेलिब्रेट करते यह दिन... दोनों की तस्वीरें लेते... कुछ फूल और शब्द भाव का कोई तोहफा देते... पर बहुत दूर हैं हम... और उगते सूरज... खिलते चाँद को देख ये तसल्ली कर लेते हैं कि ये वही चाँद और सूरज हैं... जो वहां भी उगते डूबते हैं... गगन एक ही है... इसलिए दूरी हो कर भी कोई दूरी नहीं...! मन है  न... खुद को बहलाने के कई उपाय सोच लेता है...!!!

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तस्वीरों के खजाने खंगालते हुए मिली यह तस्वीर... हमारे विवाह के समय की... करीब छह वर्ष पूर्व की तस्वीर... [मम्मी, पापा, सुशीलजी, हम, पापाजी एवं मम्मी जी]... 

Happy anniversary Mummy & Papa and belated anniversary wishes to Mummy ji and papaji. May we always be together...!!!

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धीरे धीरे जरा सी लाली नज़र आ रही है अम्बर पर... सुबह हो रही है... मन के आकाश पर भी बाल अरुण अपने किरण पथ पर चल कर आते हुए दस्तक दें... इसी प्रार्थना के साथ... विराम देते हैं... लेखनी को... और नम आँखों से धन्यवाद करते हैं ईश्वर का इस जीवन के लिए... जीवन में प्राप्त अन्यान्य नेमतों के लिए...!


बनी रहे सदा सर्वदा
स्नेह की छाँव...
खिला खिला रहे
मन का गाँव... 


धरती की ओर
झुका रहे
विस्तार लिए अम्बर...
प्रीत की रीत सुहानी हो
वैसी ही दिव्यता लिए
जिस तरह कृष्ण को प्रिय है पीताम्बर...


खेता रहे वक़्त
जीवन की नाव...
दिगदिगंत तक बनी रहे
स्नेह की छाँव...!

7 टिप्पणियाँ:

Anita 3 जून 2015 को 5:34 am  

भावभीने ये शब्द जो दिल की गहराई से निकले हैं..दिल तक ही पहुँचेंगे...बहुत बहुत शुभकामनायें इस शुभ दिन पर

अनुपमा पाठक 3 जून 2015 को 9:45 am  

धन्यवाद अनीता जी!

RAJKUMAR BHATTACHARYA 3 जून 2015 को 7:35 pm  

मौसम की जहां तक बात है तो आपने बहुत सही कही! वैसे भी कहते ही हैं कि कोयल यह जानकर नहीं गाती है कि सावन आ गया। कोयल के गाने को खुशमिजाज मौसम का प्रमाण नहीं माना जात...मौसम तो दिलों के अंदर ही होता है...!

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 4 जून 2015 को 1:42 pm  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (05-06-2015) को "भटकते शब्द-ख्वाहिश अपने दिल की" (चर्चा अंक-1997) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

प्रवीण पाण्डेय 4 जून 2015 को 2:18 pm  

स्मृतियों में ही छिपे हैं सुख के सूत्र, उन्हें पोषित करें, आनन्द से।

वाणी गीत 4 जून 2015 को 6:59 pm  

जीवन्त रहता है नेह स्मृतियों में!

हिमकर श्याम 5 जून 2015 को 11:54 am  

बहुत सुंदर और दिल को छूते भाव

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कुछ बातें अनूठी है!
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अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
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कविता तो मुझसे रूठी है!!"

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