अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

बस कुछ नमी हो...!

झिलमिल आँखों की नमी
नम करती रही मन प्राण अंतर


जीवन चलता रहा समानांतर...!


दुःख की रागिनी गाती रही
सुख के स्वप्न दिखाती रही


"एक ही सिक्के के दो पहलू हैं"-


सुख दुःख की आवाजाही
बस मन को यूँ बहलाती रही...!


सुख हो या कि दुःख 

दोनों में से कोई भी टिकता नहीं है...

दोनों में...
तत्वतः कहाँ कोई अंतर...


हर हाल में
चलता रहा है...
चलता रहता है...
चलता ही रहेगा जीवन समानांतर...


बस कुछ नमी हो...
जो नम करती रहे मन प्राण अंतर...!!!



3 टिप्पणियाँ:

kavita pandya 7 जून 2015 को 1:22 pm  

बहुत सुन्दर...
नमी बिना इंद्रधनुष नहीं सजते

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 7 जून 2015 को 4:32 pm  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (08-06-2015) को चर्चा मंच के 2000वें अंक "बरफ मलाई - मैग्‍गी नूडल से डर गया क्‍या" (चर्चा अंक-2000) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

रश्मि शर्मा 8 जून 2015 को 5:57 pm  

बहुत सुंदर....आंखों की नमी बची रहे

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