अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

ज़िन्दगी, तुम्हारे लिए!

कितनी ही
उलझनों से
घिरी हुई हो तुम...
कितनी ही उलझनें
मुझको भी घेरे है...


फिर भी
एक दूसरे के लिए
हम बिलकुल अपने है...
ये आने जाने का किस्सा है
जन्मों के ये फेरे हैं...


तुम्हारे लिये
तुम्हारी खातिर...
सब सह लेने का ज़ज्बा है
सब झेल जाने का हौसला है... 


जिजीविषा 

ज़िन्दगी की खातिर...

सदैव लड़ती है विषमताओं से, 

कौन झुठला पायेगा उसे...? 

जो नियति का अटल फैसला है...!! 

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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