अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

हम बिन पानी के मीन हैं...!

खिली रहे
मुस्कान...
धारा संग निश्चित
नाव का प्रस्थान...


हम सब
अपने अपने "तुम" तक की यात्रा में
तल्लीन हैं...
स्वाभाविक है बेचैनियाँ...
कि हम
बिन पानी के मीन हैं...!!


ये "तुम"
स्व की ही पहचान है...
अनन्य-अभिन्न,
वो अपना ही दूसरा नाम है...


उस तक पहुंचना तो
उद्देश्य  है  ही पर उस तक की यात्रा
अधिक अनमोल है...!
यात्रा सिखाती है कुछ जरूरी पाठ जीवन के
सुख दुःख से परे जिए जाते हैं जो लम्हे
उनका ही असल मोल है... ... ... !!




3 टिप्पणियाँ:

Jitendra tayal 25 जून 2015 को 6:13 am  

ये "तुम"
स्व की ही पहचान है...
अनन्य-अभिन्न,
वो अपना ही दूसरा नाम है...

खूबसूरत

Anita 25 जून 2015 को 9:52 am  

सही है..

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 25 जून 2015 को 2:32 pm  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (26-06-2015) को "यही छटा है जीवन की...पहली बरसात में" {चर्चा अंक - 2018} पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
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कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
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अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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