अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

अन्तर्द्वन्द...!

ठिठका  सा है
वातावरण
मेरे शब्द मौन हैं…
चुप चुप से सोच रहे हैं
व्यक्त हो पाये जो शब्दों में
ऐसे भाव गौण हैं…!



तो लिखना क्या…
जो हैं नहीं वो दिखना क्या… 


बस
नम आँखों से अभी
आते जाते पलों को
महसूस रहे हैं…
भ्रम चहुँ ओर फैला हो
चीखता हुआ जब झूठ हो
ऐसे में सच के हौसले
खामोश रहे हैं…  


समय सत्य को प्रतिस्थापित करेगा ही
सो सत्य निश्चिंत है…
झूठ अपने पैतरे में लिप्त
लगता घड़ी भर को ही जीवंत है… 


ये हमारे भीतर
जाने कितना कितना 

कौन है...?
व्यक्त हो पाये 

जो शब्दों में
ऐसे भाव गौण हैं… … ???

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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