ऐसा ही है जीवन
हसरतें पूरी नहीं होतीं...
उत्तर की आस ही शायद व्यर्थ है
हर बात हर किसी के लिए जरूरी नहीं होती...
कुछ मिलते सार्थक सवाल भी अगर
ज़िन्दगी यूँ अधूरी नहीं होती...
हम प्रश्न हो कर
प्रश्नचिन्ह बन कर ही जीते हैं...
अमृत कहाँ मिलेगा
गरल ही हर क्षण पीते हैं...
ऐसे में जीवन मुस्कुराता है
मौन ही मौन स्नेह जताता है...
भावविभोर फिर नम आँखें बरस जाती हैं
जब क्षितिज पर मिलने को उनकी आत्माएं तरस जाती हैं...
धरा गगन को फिर हम प्रणाम करते हैं
जितना स्नेह है मेरी झोली में सब तुम्हारे नाम करते हैं...!
3 टिप्पणियाँ:
बहुत ख़ूब
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (29-06-2015) को "योग से योगा तक" (चर्चा अंक-2021) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
बहुत सुंदर...
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