अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

शीर्षकविहीन...!

भींगे मौसम में
याद आती है...
"स्नेहिल" धूप 


स्मरण हो आता है
कितनी ही...
कविताओं का स्वरुप 


रो पड़ता है मन...!


जीवन झेल रहा होता है मृत्युतुल्य कष्ट...
तभी कोई संजीवनी शक्ति कह उठती है भीतर से--


रूठ जाना भी है नेह का ही एक अनूठा रुप...


मत विचलित हो इस भींगे मौसम से
खिल आएगी फिर से...
कब तक भला ( ? ) रूठी रहेगी
वो जो है...
स्नेहिल धूप...!!!

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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