अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

अवलंब...!

आँखों में आया
आकर रुक गया...
आंसू तुम जैसा था क्या ?
ढलकते ढलकते चूक गया...!


अब भी अटका है
पलकों पर...
और
मुस्कुरा रहा है...


उदास सी है
कोई रागिनी...
वही वो कतरा
गा रहा है...


सुन सुन कर
विभोर हूँ...
मैं रात्रि का अन्धकार हूँ
मैं ही खिली हुई भोर हूँ...


ये समय ही है
जो हमें तराशता है...
हम कुछ नहीं हैं
बुलबुलों का कहाँ आयुष्य से लम्बा वास्ता है... 



आज हैं
कल नहीं रहेंगे...
तब भी तुम्हें हम
अपना कहेंगे...

अवलंब के अभाव में
नहीं टिक सकती ज़िन्दगी की छत...
क्षमा हो,सौहार्द हो... प्रेम यथावत रहे
भले कितना भी हो जायें क्षत विक्षत...


नत हैं हमेशा से
तेरे आगे श्रद्धा से सर झुक गया...
रूठ गए जो तुम तो देखो
"जीवन" जीवन होते होते रूक गया...!

लौट आओ...
बन कर सूरज... भोर... हवा... बारिश
मेरे आकाश का "काश..."
अपनी सार्थकता जाहिर करते करते जाने क्यूँ चूक गया...

खोया सा जान पड़ा अवलंब
हाँ! "जीवन" जीवन होते होते रूक गया... ... ... !!


8 टिप्पणियाँ:

RAJKUMAR BHATTACHARYA 5 जून 2015 को 7:03 am  

आंसू क्या वाकई जीवन को जीवन होने से रोक सकते हैँ? शायद नहीं, वरना इनके होने का कोई मतलब नहीं रह जाता।

कालीपद "प्रसाद" 5 जून 2015 को 7:28 am  

जीवन के बारे में बहुत सुन्दर और गहरी सोच !
अनुभूति : अपूर्ण मकसद !:
मेरे विचार मेरी अनुभूति: चक्रव्यूह

Anita 5 जून 2015 को 11:57 am  

सचमुच समय ही हमें तराशता है...अवलम्ब पुनः पुनः मिलता है..और जीवन का फूल खिलता है...

Tushar Rastogi 6 जून 2015 को 5:07 am  

आपकी इस पोस्ट को शनिवार, ०६ जून, २०१५ की बुलेटिन - "आतंक, आतंकी और ८४ का दर्द" में स्थान दिया गया है। कृपया बुलेटिन पर पधार कर अपनी टिप्पणी प्रदान करें। सादर....आभार और धन्यवाद। जय हो - मंगलमय हो - हर हर महादेव।

धीरेन्द्र अस्थाना 6 जून 2015 को 5:17 am  

बेहतरीन ।

Onkar 6 जून 2015 को 4:26 pm  

खूबसूरत रचना

रश्मि शर्मा 6 जून 2015 को 7:39 pm  

आज हैं
कल नहीं रहेंगे...
तब भी तुम्हें हम
अपना कहेंगे...मन को छू गई पंक्‍ति‍यां

Mithilesh dubey 6 जून 2015 को 7:49 pm  

बहुत ही उम्दा रचना


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