अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

कभी तो हमें अपना कहोगे...!

कभी तो किनारे मिलेंगे
मुरझाये चेहरे कभी तो खिलेंगे
कभी तो नाव किनारे लगेगी
ज़िन्दगी कभी तो ज़िन्दगी की तरह मिलेगी
कभी तो हमें अपना कहोगे
कब तक यूँ सपना रहोगे...


कभी तो जरा सा अवकाश होगा
साथ दो घड़ी का सुकून हमारे पास होगा
कभी तो ख़ुशी आँखों से छलकेगी
नेह की भाषा बात बात में झलकेगी
कभी तो हमें अपना कहोगे
कब तक यूँ सपना रहोगे...


कभी तो विरोधाभास घुटने टेकेंगे
हम सारे अगर मगर दूर फेंकेंगे
कभी तो मौन मुखर होगा
कितने दुखों को हमने संग है भोगा
कभी तो हमें अपना कहोगे
कब तक यूँ सपना रहोगे...



4 टिप्पणियाँ:

Dilbag Virk 24 जून 2015 को 5:05 pm  

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 25-06-2017 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2017 में दिया जाएगा
धन्यवाद

सु-मन (Suman Kapoor) 25 जून 2015 को 9:28 am  

बहुत खूब

अरुण चन्द्र रॉय 25 जून 2015 को 1:53 pm  

बहुत सुन्दर

Sound of Silence 28 जुलाई 2015 को 12:05 pm  
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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