अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

बूँदें हैं, नमी है...!!

बादल हैं, बारिश है, 

बूँदें हैं, 

नमी है...
सफ़र में 

साथ साथ चल रहे
आसमां और ज़मीं हैं...


यहाँ 

सब कुछ
बिखरा बिखरा है...
हो सके 

तो आ जाओ
दोस्त! तुम्हारी ही कमी है...


कितनी दूरी है, 

है कितना सामीप्य
कहो! क्या कभी माप पाएंगे हम...
बस ये जानो 

आँखों से ओझल हुए हो
तब से ही सांसें जैसे थमी हैं...


बादल हैं, बारिश है, 

बूँदें हैं, 

नमी है...
सफ़र में 

साथ साथ चल रहे
आसमां और ज़मीं हैं...


इक मेरा मन उदास है 

अपनी ख़ामियां 

गिन गिन कर...
कोई क्यूँ रहे भी पास
कि मुझमें 

लाखों कमी है...


ज़िन्दगी की राह में
जीवन से मिलने का अवसर 

आता है कभी कभी
घटित हुआ था वह एक दुर्लभ संयोग सा
तब से ही उसी मोड़ पर उसकी राह तकती 

निगाहें मेरी थमी हैं...


बादल हैं, बारिश है, 

बूँदें हैं, 

नमी है...
सफ़र में 

साथ साथ चल रहे
आसमां और ज़मीं हैं...!

2 टिप्पणियाँ:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 20 जून 2015 को 2:07 pm  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (21-06-2015) को "योगसाधना-तन, मन, आत्मा का शोधन" {चर्चा - 2013} पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
अन्तर्राष्ट्रीय योगदिवस की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

Onkar 21 जून 2015 को 2:12 pm  

बहुत सुन्दर

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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