अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

जरा गुनगुना कर देखो...!

अँखियों में
एक ख़्वाब नया
सजा कर देखो...
मंज़िल भी मिल जाएगी
ज़रा कदम तो बढ़ा कर देखो!


भूलना हो गर...
अपने हिय का दर्द
दूसरों के गम को अपना कर देखो!


अनुभूति में है बसती
इसकी आत्मा...
ज़िन्दगी को कभी
किताबी परिभाषाओं से परे हटा कर देखो!


रास्ते हैं, सफ़र है, मंजिलें हैं
जरा गुनगुना कर देखो...
वो भी आ जायेगा पास
पहल तुम ही कर लो
कदम तो बढ़ा कर देखो! 


ज़िन्दगी को कभी
किताबी परिभाषाओं से परे हटा कर देखो...!!!


1 टिप्पणियाँ:

Jitendra tayal 24 जून 2015 को 4:34 am  

ज़िन्दगी को कभी
किताबी परिभाषाओं से परे हटा कर देखो...!!!

बहुत सुन्दर विचार एवं अभिव्यक्ति....

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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