अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

वो केवल निमित्त थी...!

नियति ने
सब तय कर रखा होता है...
लीलाधर की लीला है
सब परमेश्वर की माया है...


निमित्त मात्र बना कर लक्ष्य वो साधता है
ईश्वर स्वयं पर कभी कोई इलज़ाम नहीं लेता है
यूँ रचे जाते हैं घटनाक्रम बड़े उद्देश्य की पूर्ती हेतु
जिसे आयाम देने को बनता है कोई जीव ही सेतु 


कैकेयी भी केवल निमित्त थी...
माँ थी वो... वो सहज सौम्य चित्त थी...


ये समय की मांग थी
जिसे कैकेयी ने स्वीकारा था...
राम के वन गमन की पृष्ठभूमि तैयार करनी थी न
सो कैकेयी ने यूँ अपना ममत्व वारा था... 



सारा कलंक अपने ऊपर ले कर
माँ ने अद्भुत त्याग किया...
राम "राम" हो सकें इस हेतु
कैकेयी ने वर में पुत्र को वनवास दिया...


कौन समझेगा इस ममता को... ?
ऐसे अद्भुत त्याग को...!
वीरांगना थी कैकेयी...
दुर्लभ है समझना उस आग को...!!!


*** *** ***

इसीलिए तो
अपने आस पास हम
"सुमित्रा" और "कौसल्या" तो सुन लेते हैं
पर "कैकेयी" किसी का नाम नहीं होता! 


क्यूंकि...
कैकेयी होना किसी के वश की बात नहीं...
अपनी कीर्ति-अपकीर्ति की परवाह किये बिना जो समर्पित हो
ऐसी भक्ति दुर्लभ है... अब ऐसी दिवा रात नहीं... 


उच्च उदेश्य की खातिर मिट जाना
जीवन का एकमात्र उद्देश्य यही... है यही शाश्वत एक तराना 


कैकेयी का पात्र ऐसी ही अविरल प्रेरणा है...
राम जानते थे अपनी माता की विशालता को...
उसे समझने की खातिर...
जग को अभी बहुत कुछ बुझना देखना है... ...!!!

2 टिप्पणियाँ:

रश्मि प्रभा... 23 जून 2015 को 12:03 pm  

कैकेयी होना आसान नहीं

Roshi 25 जून 2015 को 7:19 pm  

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