अनुशील

...एक अनुपम यात्रा

भींगा भींगा शहर है...!

खूब सारे रंग हैं
बारिश है…
भींगा भींगा शहर है…! 


खुशियाँ 

अनचीन्हीं अजानी हैं…
बादलों के पीछे से
झाँकती
जरा सी धूप है…  

अजाने ग़मों का कहर है…! 


हर क्षण
बीत रही है…
ज़िन्दगी
ढ़लता हुआ पहर है…!!

4 टिप्पणियाँ:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 18 जून 2015 को 1:53 pm  

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (19-06-2015) को "गुज़र रही है ज़िन्दगी तन्‌हा" {चर्चा - 2011} पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

कालीपद "प्रसाद" 18 जून 2015 को 6:49 pm  

बहुत सुन्दर

सु-मन (Suman Kapoor) 20 जून 2015 को 9:45 am  

बहुत बढ़िया

Onkar 20 जून 2015 को 11:54 am  

बहुत सुन्दर

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"कुछ बातें हैं तर्क से परे...
कुछ बातें अनूठी है!
आज कैसे
अनायास आ गयी
मेरे आँगन में...
अरे! एक युग बीता...
कविता तो मुझसे रूठी है!!"

इन्हीं रूठी कविताओं का अनायास प्रकट हो आना,
"
अनुशील...एक अनुपम यात्रा" को शुरुआत दे गया!

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