पापा से बातचीत का एक अंश ----------------------------------------
वेद और हम
हमारी प्राचीन परम्परा और मान्यता यही थी --
"निष्कारणं ब्राह्मणेण षड्गों वेदोधेयोगेयश्च"
अर्थात यह कि वेदाध्ययन से अर्थ की, यश की स्वर्ग की प्राप्ति होगी या नहीं होगी, यह सब विचार छोड़ कर ब्राह्मण को वेदपाठ, वेदाध्ययन, वेद भगवान का ध्यान करना चाहिए।
लेखन के साधन के अभाव मे वेद के पाठ की निरन्तरता एवं सुनकर स्मृति मे शिष्य परम्परा ने इसे जीवित रखा था, फिर लेखन कला और बनाई गई स्याही से तालपत्र एवं भुर्जपत्र पर वेद भगवान आदिम अवस्था में मानस से अवतरित हुए, फिर कालान्तर में छापे की मशीन और कागद के अविष्कार ने जन जन के लिए वेदभगवान को उपलब्ध कराया । आज उस सुविधा के कारण वेदों का मूर्तरूप तो आवश्यकतानुसार उपलब्ध है, पर अर्थप्रधान इस युग ने ब्राह्मणों को भी "अर्थकरी च विद्या" की ओर ज्यादा आकर्षित किया और धीरे-धीरे "निष्कारणं ब्राह्मणेण षड्गो वेदोधेयोगेयश्च" की मान्यता लुप्त होती गई, अब कुछ गुरुकुल देश के अन्दर भी इसके स्वरूप के संरक्षण में प्रयत्नशील हैं, संस्कृति और संस्कार के लिए संस्था या सरकारी पहल ही, आज के युग मे कार्य करने की दिशा में कारगर हो सकती है (सामुहिक तौर पर); व्यक्तिगत तो इच्छुक व्यक्ति के लिए स्वप्रयास ही काफी है ।
1 टिप्पणियाँ:
सराहनीय और विचारणीय आलेख .
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